Sunday, August 18, 2013

इकरारनामा-भाग पांच

मुसबिर, रस्म-ओ -रिवाज़ को तोड़कर घड़ियाँ जो आई है,
बना तस्वीर मेरी, तकदीर से जुदा, फ़तह की.

Tuesday, August 13, 2013

इकरारनामा-भाग चार

बहुत अर्जियां हो गई यार तुमसे,
आंखों में अब तो सपने हलाल हो गये. 

Thursday, April 4, 2013

सभ्यता का चक्र

इंसानी सभ्यता का चक्र कितना सख्त है। ये हर किसी को कुचल सकता है। व्यक्तिगत भव्यता इसके सामने कुछ भी बाधा पैदा नहीं कर सकती। हालाँकि मानवीय सोंच का बड़ा हिस्सा बेकार और कूड़ा है। किसी काम का नहीं है। पर अंततः ये कूड़ा हीं, जो की तमाम मानवीय सभ्यता के दौरान निकला और विकसित हुआ है, विघटित होकर रास्तों के औधार्नाओ का पहला मूर्त रूप सामने लाया है।
            ये जरुरी है मानवीय सभ्यता के अनवरतता के लिए की ऐसे ख्याल बेबाकी से विकसित होते रहे। पर इसके उलट ऐसी सोंच हमारी व्यक्तिगत प्रतिबधताओ के प्रति सजग नहीं होती। खुदाई के लिए इसे कम करना होगा। इससे जुदा एक संजीदा और मजबूत ख्याल लाना होगा।
            हमने देखा है कई पर्वतों को नींचे आते हुए, टूटते हुए। बिखरे हुए इनके हिस्से कभी इनके वास्तविक अस्तित्व को बना नहीं सकते। ये किसी और के बुनियाद और चमक का हिस्सा बन अपनी पहचान भी खो देते है। और सभ्यता का चक्र ऐसे ही चलता रहता है।

Saturday, December 15, 2012

सियासत

दिल्ली की सडकों पे भीड़ आज कैसी है,
शायद सियासत की पेट बड़ी भूखी है।

कहते हैं, उनके दामन पे कीचड़ अब उछल दो,
धोने को पानी नहीं, नदियाँ पड़ गईं सुखी हैं।

उनके जलाये सिगार पर रोटियां ना सेंका करो,
खा लो जैसी भी हैं, कच्ची हैं, रुखी हैं।

इस जलजले में नई बुनियाद का तजुर्बा उन्हें नहीं है,
फ़हम से गलत उनके आज दीवारें भी दुखी हैं।

ज़बानों से उनकी इख्त्लाकी का तुम गरज जान लो,
रिवायतों में फ़ना से कम कुछ नहीं है।

रात हीं अब ज्यादा बेहतर है, छुप के जी लो,
दिन के आलम में ये कैसी झंझलाहट कैसी बेरुखी है।

Wednesday, August 29, 2012

इकरारनामा-भाग तीन

मालूम हमें है प्रेम नगर के किस्से भी,
कुछ अपने है कुछ गैरों के है हिस्से भी.
           सबने दिल से पैगाम यही भिजवाया है,
           सब माया है.

Friday, August 24, 2012

इकरारनामा-भाग दो

नाफरमानियाँ, परदे के पीछे करते वही हैं अब तो,
सौंपा जिन्हें था हमने सरो-ताज ज़िन्दगी का.

Tuesday, August 7, 2012

इकरारनामा-भाग एक

भर लेने दो मेरे सिने में इतनी तपन,
कायम रहे रगों में उबाल रक्त का.