फरिस्ते आसमां से देख कर मदहोस रहते है जिन्हें,
तू चाँद से क्यों रूठ कर सिकवा सूनाते हो मुझे।
शरम से झुककर नजरें जो रहतीं नम उन्हें क्यों भुलकर,
शरारत लव पे आ जाएँ यूँ बेताब लगते हो मुझे।
नहीं तुम राज दिल का जानकर करते रहे हठखेलियाँ,
कभी उस रैन के इल्हाम की चोला लिए दिखाते मुझे।
पर क्या करे हमराह न मिलते न मिलती जिंदगी,
इस बार भी तनहा रहे उस बार भी तनहा रहे.
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