शायद सियासत की पेट बड़ी भूखी है।
कहते हैं, उनके दामन पे कीचड़ अब उछल दो,
धोने को पानी नहीं, नदियाँ पड़ गईं सुखी हैं।
उनके जलाये सिगार पर रोटियां ना सेंका करो,
खा लो जैसी भी हैं, कच्ची हैं, रुखी हैं।
इस जलजले में नई बुनियाद का तजुर्बा उन्हें नहीं है,
फ़हम से गलत उनके आज दीवारें भी दुखी हैं।
ज़बानों से उनकी इख्त्लाकी का तुम गरज जान लो,
रिवायतों में फ़ना से कम कुछ नहीं है।
रात हीं अब ज्यादा बेहतर है, छुप के जी लो,
दिन के आलम में ये कैसी झंझलाहट कैसी बेरुखी है।