फैसला वो महज़ मेरा नहीं था,
मुझे देख तुमने नज़रे झुकाई थी।
वो अदा थी तुम्हारी, मुझे
मेरी ज़िन्दगी अता करने की।
मेरे खाबों को अपने दिल में सजाने के लिए,
बड़े नाज़ुक से पहरे खंजर चलाई थी,
शायद तुमने दरख्तें बनाई थी।
और मुझे देख तुमने नज़रें झुकाई थी।
जब सूरज की किरणों को मद्धम कर
अधियारे ने अपनी बाहें फैलाईं थीं,
तब मेरी ओ समां तुमने खुद को
जलाकर सिसकियाँ खिलखिलाई थी।
और मुझे देख तुमने नज़रें झुकाई थी।
ज़िन्दगी बेपनाह होकर जब तुम्हे पुकारा था,
शायद तब तुने कदमों तले पलकें बिछाईं थी,
आज मैं जब तुम्हारे करीब था,
छोड़ के जाने का फैसला महज़
तुम्हारा ही होगा तनहा मुझे
हो बेआबरू कभी बक्शी जुदाई थी।
boss aap to chha gaye hain aaj kal, hum aapke diwane ho gaye hain
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