बहती हवावों से रातोके खाबों में,
भींगी भींगी पलको की याद मुझे आती है।
सीढियों से कदमों के आहट सुनना,
नजरें झुका कर नखों को दबाना
सलीके से बिखरी यूँ जुल्फें तुम्हारी
सजाना लवों पे कोमलता की लाली
ख़ामोशी की लफ्जों में कहना बहुत कुछ,
शरम की अदाओं की याद मुझे आती है।
धड़कन ये रातों को कहती मुसलसल
न जीना है मेरा मुक्कमल वहां तक
फना हो के रौशन मै कर दू कहो तो
जहाँ तेरी नजरें भी रहती वहां तक
वो शोकी में बैठे बताना बहुत कुछ,
और ठहरे फिजाओं की याद मुझे आती है।
अभिषेक
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