Thursday, April 4, 2013

सभ्यता का चक्र

इंसानी सभ्यता का चक्र कितना सख्त है। ये हर किसी को कुचल सकता है। व्यक्तिगत भव्यता इसके सामने कुछ भी बाधा पैदा नहीं कर सकती। हालाँकि मानवीय सोंच का बड़ा हिस्सा बेकार और कूड़ा है। किसी काम का नहीं है। पर अंततः ये कूड़ा हीं, जो की तमाम मानवीय सभ्यता के दौरान निकला और विकसित हुआ है, विघटित होकर रास्तों के औधार्नाओ का पहला मूर्त रूप सामने लाया है।
            ये जरुरी है मानवीय सभ्यता के अनवरतता के लिए की ऐसे ख्याल बेबाकी से विकसित होते रहे। पर इसके उलट ऐसी सोंच हमारी व्यक्तिगत प्रतिबधताओ के प्रति सजग नहीं होती। खुदाई के लिए इसे कम करना होगा। इससे जुदा एक संजीदा और मजबूत ख्याल लाना होगा।
            हमने देखा है कई पर्वतों को नींचे आते हुए, टूटते हुए। बिखरे हुए इनके हिस्से कभी इनके वास्तविक अस्तित्व को बना नहीं सकते। ये किसी और के बुनियाद और चमक का हिस्सा बन अपनी पहचान भी खो देते है। और सभ्यता का चक्र ऐसे ही चलता रहता है।