Wednesday, February 8, 2012

इस घनी बरसात में

लगाये थे हमने लौ,
           तूफानी इस अँधेरी रात में.
पर जल रही है अब हथेलिया,
           छुपाने में इसे इस घनी बरसात में.

फिर भी तुम कहाँ हो, 
           आँखों से ओझल अस्ताचल से पार,
और तनहा मै निकल आया हूँ,
            शौक-ऐ-दीदार तेरे इस घनी बरसात में.

पर दिल ये कहता है बाहें फैला दूं,
             और लिपट जाऊं तेरे पगरज से,
कि कहीं बारिश कि एक फुहार 
             कर दे इसे अदृश्य इस घनी बरसात में.

अब सफ़र के आखिरी मुकाम पर,
              जब इस पार बारिश हो रही है,
चलो उस पार चलते है,
              लिए लौ को हथेलियो पे इस घनी बरसात में.

            



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